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हाई कोर्ट का सरकार को झटका, 32 साल के संघर्ष के बाद वीरांगना को मिलेगी पेंशन

नैनीताल : हाई कोर्ट ने स्वतंत्रता सेनानी की वीरांगना को आवेदन के बाद एकाएक नियम बदल जाने से नहीं दी जा रही पेंशन पर बेहद तल्ख टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की वीरांगना को आवेदन की तिथि से अब तक की पेंशन का भुगतान करने का आदेश पारित किया है।
वरिष्ठ न्यायमूर्ति संजय कुमार मिश्रा की एकलपीठ के समक्ष हल्दूचौड़ (नैनीताल) के गंगापुर कब्डाल निवासी मोहिनी देवी की याचिका पर सुनवाई हुई। याचिका में मोहिनी ने कहा है कि उनके पति मथुरा दत्त कब्डाल की 1979 में मृत्यु हो गई थी लेकिन उनको पेंशन नहीं दी जा रही है। उनके पति 1946 में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन करने पर जेल गए थे। उन्हें दो माह के कारावास की सजा सुनाई गई थी।
मोहिनी ने पति की मृत्यु के बाद 1990 में प्रशासन के समक्ष स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित पेंशन के लिए आवेदन किया। पट्टी पटवारी ने रिपोर्ट लगाई और अपर जिलाधिकारी ने संस्तुति सहित प्रकरण शासन को भेजा। 2018 में गृह विभाग उत्तराखंड ने पेंशन का आवेदन इस आधार आवेदन निरस्त कर दिया कि 2014 में यह पुराना नियम बदल कर यह कर दिया है कि उसी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी या आश्रित को पेंशन दी जाएगी, जो स्वतंत्रता सेनानी न्यूनतम दो माह तक जेल गए हों। याचिकाकर्ता के पति दो माह से कम समय तक जेल गए थे।
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि उनके पति के नाम पर एनडी तिवारी ने विद्यालय सभागार बनाया। शिलापट में भी उनका नाम दर्ज है। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की एकलपीठ ने सरकार के 2014 में बदले गए नियम को निरस्त करते हुए वीरांगना को आवेदन के वर्ष 1990 से अब तक की पेंशन का भुगतान करने के आदेश दिए हैं।
हाईकोर्ट की एकलपीठ ने टिप्पणी की कि जिन स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और संघर्ष की वजह से हम खुली हवा में सांस ले रहे हैं, उनके आश्रितों को पेंशन के लिए चार दशक का इंतजार करना पड़ा, यह बेहद कष्टदायक है।

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