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अंग्रेजों के जमाने का है राजद्रोह कानून, अब तक लागू क्यों?

सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार से पूछा

  • भारत में आजादी की मांग उठाने वाले लोगों की आवाज दबाने के लिये अंग्रेजों का बनाया था राजद्रोह कानून
  • क्या पीएम या सीएम के किसी फैसले पर सवाल उठाना राजद्रोह है? ऐसे कानून को खत्म क्यों नहीं करते?
  • कहा- हमारी चिंता इस कानून के दुरुपयोग को लेकर, यह कानून लोगों और संस्थानों के लिए गंभीर खतरा
  • इस कानून को बनाने वाले ब्रिटेन ने ही कर दिया है रद्द, अमेरिका समेत कई देशों ने भी किया खत्म

नई दिल्ली। आज गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने राजद्रोह विरोधी कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि यह कानून अंग्रेजों के जमाने का है। अंग्रेज स्वतंत्रता आंदोलन को कुचलने के लिए इस कानून का इस्तेमाल करते थे। यह कानून आजादी की मांग उठाने वाले लोगों की आवाज दबाने के लिए इस्तेमाल होता था। क्या हमें आजादी के 75 साल बाद भी ऐसे कानून की जरूरत है? हमारी चिंता इस कानून के दुरुपयोग को लेकर है। यह कानून व्यक्तियों और संस्थानों के लिए गंभीर खतरा है।
दरअसल यह मामला भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी की धारा 124-A से जुड़ा है। यही धारा देशद्रोह के मामले में सजा तय करती है। इसके तहत अधिकतम उम्र कैद की सजा का प्रावधान है। सेना के सेवानिवृत्त मेजर जनरल एसजी वोम्बटकेरे ने इस धारा को चुनौती देती याचिका दायर की है। याचिका में उनकी दलील है कि यह धारा बोलने की आजादी पर असर डालती है। एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने भी ऐसी याचिका दायर की है। मई में मणिपुर के 41 वर्षीय किशोरचंद्र वांगखेमचा और छत्तीसगढ़ के 53 वर्षीय कन्हैया लाल शुक्ला ने याचिका दाखिल की थी। दोनों पत्रकार हैं। दोनों के खिलाफ इस सेक्शन के तहत केस दर्ज हुआ है और दोनों को जेल में भी रहना पड़ा है। पत्रकारों का आरोप है कि सरकारें आलोचना भी सुनने को तैयार नहीं हैं। अगर कोई आलोचना करता है तो सेक्शन 124-A के तहत उसे गिरफ्तार कर लिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं पर मोदी सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। 

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की 5 अहम टिप्पणियां

1. मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन्ना ने कहा कि सरकार कई कानूनों को खत्म कर रही है, फिर वह इस राजद्रोह विरोधी कानून के बारे में विचार क्यों नहीं कर रही? 
2. जब हम कानून के इतिहास को देखते हैं तो पाते हैं कि इसका खतरनाक इस्तेमाल ठीक उसी तरह हुआ है, जैसे कोई बढ़ई अपनी आरी से किसी एक पेड़ को काटने की बजाय पूरे जंगल को ही काट दे।
3. धारा 124-A के तहत इतनी शक्तियां मिली हुई हैं कि एक पुलिस अफसर ताश या जुआ खेलने जैसे मामलों में भी किसी के खिलाफ राजद्रोह की धारा लगा सकता है। 
4. हालात इतने खराब हैं कि अगर कोई सरकार या पार्टी किसी की आवाज न सुनना चाहे तो वह उन लोगों के खिलाफ इस कानून का इस्तेमाल कर लेगी। लोगों के सामने यही गंभीर सवाल है। 
5. केंद्र सरकार अंग्रेजों के दौर के इस कानून को हटा क्यों नहीं देती? 

केंद्र की दलील- पूरी तरह रद्द करने की जरूरत नहीं : सुनवाई के दौरान मोदी सरकार का पक्ष रखते हुए अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि इस कानून के प्रावधान को पूरी तरह से रद्द करने की जरूरत नहीं है, लेकिन निश्चित रूप से इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए मानदंड निर्धारित किए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि जस्टिस यूयू ललित की अध्यक्षता वाली एक अलग पीठ ने पहले भी इसी तरह की याचिका पर नोटिस जारी किया था। उस मामले की सुनवाई के लिए 27 जुलाई की तारीख तय की गई है। इस मामले को भी उसके साथ जोड़ा जा सकता है। हालांकि शीर्ष अदालत ने प्रावधान के दुरुपयोग पर अपनी टिप्पणियां जारी रखीं। 
विधि आयोग ने दोबारा विचार करने का सुझाव दिया था : वर्ष 2018 में विधि आयोग की एक रिपोर्ट में धारा 124-ए पर कुछ बातें कही गई थीं। इसमें सुझाव दिया गया था कि अगर कानून व्यवस्था की स्थिति बिगाड़ने और सरकार को हिंसक या गैरकानूनी तरीके से हटाने की नीयत से कोई गतिविधि हुई हो, तभी इस धारा का इस्तेमाल होना चाहिए।
10 साल में 11 हजार लोगों के खिलाफ दर्ज हुए देशद्रोह के मामले : देश की कानून व्यवस्था से जुड़ी रिसर्च करने वाली संस्था आर्टिकल-14 डॉट कॉम की इस साल फरवरी में आई रिपोर्ट कहती है कि देश में 2010 से 2020 के बीच 11 हजार लोगों के खिलाफ देशद्रोह के 816 केस दर्ज हुए। इनमें से 65 फीसद मामले 2014 के बाद दर्ज हुए हैं।?
देशद्रोह के कानून को रद्द करने पर पहली बार बहस नहीं छिड़ी है। पहले भी इस पर खूब बहस हुई है। पिछले महीने पत्रकार विनोद दुआ के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों को कड़ी फटकार लगाई थी। आइए समझते हैं कि यह कानून क्या है? कब लागू हुआ? सरकारें किस तरह इसका दुरुपयोग करती हैं?
धारा 124-ए पर इतना बवाल क्यों? : भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 124-ए में राजद्रोह की सजा का उल्लेख है। पर यह कैसे पता चलेगा कि किसी व्यक्ति ने राजद्रोह किया है या नहीं। इस पर कानून में राजद्रोह के चार स्रोत बताए गए हैंः बोले गए शब्द, लिखे गए शब्द, संकेत या कार्टून, पोस्टर या किसी और तरह से प्रस्तुति। अगर दोष साबित हो गया तो तीन साल की सजा या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। अधिकतम सजा उम्रकैद की है।
इस सेक्शन के साथ तीन स्पष्टीकरण भी दिए गए हैं। असंतोष में देशद्रोही और दुश्मनी की सभी भावनाएं शामिल हैं। दूसरा और तीसरा स्पष्टीकरण कहता है कि कोई भी व्यक्ति सरकार के फैसलों या उपायों पर टिप्पणी कर सकता है, पर उसमें उसका अपमान या नफरत नहीं होनी चाहिए। अगर आपने कहा कि यह सरकार अच्छी है, पर वैक्सीन पॉलिसी खराब है तो यह राजद्रोह नहीं है। पर अगर आपने सिर्फ इतना लिखा या कहा कि सरकार की वैक्सीन पॉलिसी खराब है तो यह राजद्रोह बन सकता है। हालिया उदाहरण तो कुछ इसी तरह के निकले हैं।
इस कानून को किसने और क्यों बनाया था? : वर्ष 1870 में 124-ए आईपीसी का हिस्सा बना और लागू हुआ। इस कानून को जेम्स स्टीफन ने लिखा था। राजद्रोह से जुड़े कानून पर जेम्स का कहना था कि सरकार की आलोचना बर्दाश्त नहीं होगी। उसने तो यह फैसला भी पुलिस पर छोड़ दिया था कि किस हरकत को देशद्रोह माना जा सकता है और किसे नहीं। साफ है कि गोरे भारत की आजादी के आंदोलन को दबाना चाहते थे और इसके लिए कानून लाया गया था। ताकि आंदोलनकारियों को दबाया जा सके।
इस कानून को लेकर 1891 के बांगोबासी केस, 1897 और 1908 में बाल गंगाधर तिलक के केस और 1922 में महात्मा गांधी के केस में अदालतों ने कहा कि जरूरी नहीं कि हिंसा भड़कनी चाहिए। अगर अधिकारियों को लगता है कि किसी बयान से सरकार के खिलाफ असंतोष भड़क सकता है तो राजद्रोह के तहत गिरफ्तार कर सजा सुनाई जा सकती है। तिलक के केस में तो जस्टिस आर्थर स्ट्राची ने कहा था कि असंतोष भड़काने की कोशिश करना भी राजद्रोह है।

मोदी के केंद्र में सरकार बनाने के बाद केस बढ़े? : आर्टिकल-14 डॉट कॉम ने 2020 में एक रिसर्च में यह दावा किया है। रिसर्च पोर्टल का दावा है कि 2010 से 2020 के बीच करीब 11 हजार लोगों के खिलाफ देशद्रोह के 816 केस दर्ज हुए। इसमें 65% लोगों को मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद आरोपी बनाया गया। इनमें विपक्ष के नेता, छात्र, पत्रकार, लेखक और शिक्षाविद शामिल हैं। 405 भारतीयों के खिलाफ नेताओं और सरकारों की आलोचना करने पर राजद्रोह के आरोप लगे। इनमें 96% केस 2014 के बाद रजिस्टर हुए। इसमें भी 149 पर मोदी के खिलाफ गंभीर और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करने का आरोप है। 144 केस यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की आलोचना करने के हैं।
मनमोहन सिंह की यूपीए-2 सरकार की तुलना में 2014 से 2020 के बीच हर साल राजद्रोह के केस में 28% की बढ़ोतरी हुई है। ज्यादातर केस सरकार के खिलाफ हुए आंदोलनों को लेकर दाखिल हुए। इनमें ज्यादातर केस नागरिकता कानून में संशोधन और हाथरस में दलित किशोरी के दुष्कर्म के विरोध में हुए आंदोलनों को लेकर दर्ज हुए।
आज सुप्रीम कोर्ट के सामने जो प्रश्न है, वह छह दशक पहले भी था। वर्ष 1962 में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार के खिलाफ दाखिल केदारनाथ सिंह की याचिका पर राजद्रोह के कानून यानी सेक्शन 124-A को कायम रखा था। उसके बाद से हर केस में इस फैसले का जिक्र आता है।
वर्ष 1953 में केदारनाथ सिंह बिहार में फॉरवर्ड कम्युनिस्ट पार्टी के नेता थे। बेगूसराय की एक रैली में उन्होंने सत्ताधारी कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोला था। उन्होंने कहा था… ‘आज सीबीआई के कुत्ते बेगूसराय के आसपास घूम रहे हैं। कई ऑफिशियल कुत्ते इस रैली में भी हैं। भारत के लोगों ने जिस तरह अंग्रेजों को देश से बाहर निकाला और कांग्रेसी गुंडों को गद्दी पर बिठा दिया। जिस तरह हमने गोरों को भगाया, वैसे ही हम कांग्रेसियों को भी भगाएंगे।’
केदारनाथ के ऐसे तीखे भाषण के बाद प्रशासन सक्रिय हुआ। फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट ने केदारनाथ को राजद्रोह का दोषी माना और सजा सुना दी। पटना हाईकोर्ट ने भी उनकी अपील को खारिज कर दिया। तब वर्ष 1962 में सुप्रीम कोर्ट में केदारनाथ सिंह ने सेक्शन 124-ए की संवैधानिक वैधता को खत्म करने की मांग की थी। उनका कहना था कि संविधान के आर्टिकल 19 में उन्हें बोलने की आजादी मिली है और यह कानून उन्हें अधिकार से वंचित कर रहा है।
तब सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान बेंच ने इस कानून की वैधता को तो कायम रखा, पर इसका इस्तेमाल कब और कैसे किया जा सकता है, इसके लिए नियम तय कर दिए। तय हुआ कि सरकार की आलोचना करना राजद्रोह नहीं है। अगर लिखे या कहे गए शब्द सरकार के खिलाफ हिंसा भड़काने या कानून-व्यवस्था बिगाड़ने के लिए हैं तो ही राजद्रोह का दोष बनेगा, अन्यथा नहीं।
अब मामला फरवरी 2020 का है। कर्नाटक के बिदार में स्कूली बच्चों ने 21 जनवरी 2020 को एक नाटक प्रस्तुत किया था। इसकी कुछ लाइनें नागरिकता कानून के खिलाफ थीं। केस दर्ज हुआ तो पुलिस ने चार बार कक्षा 6, 7 और 8 के बच्चों के साथ पूछताछ की।

पर क्या केदारनाथ सिंह केस के बाद दुरुपयोग थम गया? : लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी अचारी का कहना है कि केदारनाथ सिंह केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर किसी ने हिंसा या बगावत के लिए नहीं उकसाया है तो यह राजद्रोह नहीं है। पर इसके बाद भी कानून के दुरुपयोग के रास्ते बंद नहीं हुए हैं। किसी पुलिस वाले को लगता है कि कोई कार्टून कानून-व्यवस्था को खराब कर सकता है तो वह कार्टूनिस्ट को गिरफ्तार कर लेगा। अचारी के मुताबिक उस पुलिस वाले की व्यक्तिगत राय महत्वपूर्ण हो जाती है। केदारनाथ जजमेंट ने लॉ एनफोर्समेंट मशीनरी को नागरिकों के अधिकार छीनने का रास्ता साफ कर दिया है। लोकतंत्र में लोगों को सरकार को बदलने का अधिकार है। अगर सरकार नाकाम रहती है तो उन्हें असंतोष दिखाने का अधिकार मिलना चाहिए। सरकार से नफरत करने पर दंडित करने वाले राजद्रोह के कानून से अधिकारों का हनन होता है। बड़ी बेंच को अब केदारनाथ जजमेंट का रिव्यू करना बेहद जरूरी हो गया है।
गौरतलब है कि विनोद दुआ ने पिछले साल सरकार की लॉकडाउन पॉलिसी पर सवाल उठाए थे। खासकर बड़े शहरों से पलायन करने वाले मजदूरों से जुड़े मुद्दे उठाए थे। इस पर उनके खिलाफ राजद्रोह का केस दर्ज हुआ। पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने दुआ को राहत प्रदान की।
विनोद दुआ ने पिछले साल सरकार की लॉकडाउन पॉलिसी पर सवाल उठाए थे। खासकर बड़े शहरों से पलायन करने वाले मजदूरों से जुड़े मुद्दे उठाए थे। इस पर उनके खिलाफ राजद्रोह का केस दर्ज हुआ। पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने दुआ को राहत प्रदान की।
दुनियाभर में रद्द हो चुके हैं राजद्रोह कानून : दुनिया को राजद्रोह से जुड़े कानून देने वाले यूके में यह 2009 में खत्म हो गया है। इसी तरह ज्यादातर देश या तो इसे खत्म कर चुके हैं या दुरुपयोग रोकने के लिए शब्दों में बदलाव कर चुके हैं। आइए जानते हैं कि कहां क्या स्थिति है-
ब्रिटेन : वर्ष 2009 में राजद्रोह कानून रद्द हो गया। यह बदलाव 12 जनवरी 2010 से लागू हुआ। पर ऐसे व्यक्ति के खिलाफ राजद्रोह का केस चल सकता है जो यूके का नागरिक नहीं है।
न्यूजीलैंड : संसद ने वर्ष 2007 में राजद्रोह से जुड़े कानून को रद्द कर दिया। यह बदलाव 1 जनवरी 2008 से लागू हुआ।
स्कॉटलैंड : क्रिमिनल जस्टिस एंड लाइसेंसिंग एक्ट 2010 के सेक्शन 51 के हवाले से 28 मार्च 2011 से राजद्रोह के तहत सभी प्रावधानों को हटा दिया गया।
इंडोनेशिया : 2007 में इंडोनेशिया ने राजद्रोह कानून को असंवैधानिक करार दिया।
घाना : संसद ने क्रिमिनल लिबेल एंड सिडेशियस लॉ को रद्द किया। इससे राजद्रोह का कानून खत्म हो गया।
ऑस्ट्रेलिया : क्राइम एक्ट 1920 में राजद्रोह अपराध था। वर्ष 1984 और 1991 में इसकी समीक्षा हुई। 2010 में राजद्रोह शब्द की जगह ‘हिंसक अपराधों के लिए उकसावा’ लिखा गया।
अमेरिका : कानून में इतने बदलाव हो चुके हैं कि यह अब डेड लॉ है। कानून में ‘यूज ऑफ फोर्स’ और ‘कानून का उल्लंघन’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल राजद्रोह को परिभाषित करने के लिए किया गया है।
भारत में स्थिति : लॉ कमीशन की 2018 की रिपोर्ट में सेक्शन 124-ए पर विस्तार से चर्चा की गई थी। इसमें सुझाया गया कि सेक्शन 124-ए का इस्तेमाल उन्हीं मामलों में होना चाहिए जहां कानून-व्यवस्था को बिगाड़ने या सरकार को हिंसक या अवैध तरीके से हटाने की मंशा दिखाई दे। सिविल राइट एक्टिविस्ट, वकील और कई एकेडेमिशियन भी इसकी मांग कर रहे हैं।

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