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स्कूलों की पांचों उंगलियां घी में और सिर कढ़ाई में!

भाजपा नेता ने बयां किया अभिभावकों का दर्द

  • कोरोना के कारण स्कूल खुले या बंद रहे, उनको अब किसी तरह से घाटा नहीं होने वाला
  • स्कूल के संसाधन इस्तेमाल न होने से बचा काफी खर्च, स्टाफ को दे रहे आधा वेतन  
  • कई स्कूलों ने बिना ऑनलाइन पढ़ाई के भी दो माह की एक साथ ले ली पूरी फीस

देहरादून। प्रदेश में स्कूलों की फीस के मुद्दे घमासान मचा हुआ है। अब प्रदेश सरकार का फैसला भी अभिभावकों के बजाय स्कूलों के हक में चला गया। वे अब डेढ़ घंटे की ऑनलाइन पढ़ाई का कोरम पूरा करेंगे और इसकी एवज में पूरी ट्यूशन फीस वसूलेंगे। इससे स्कूलों की पांचों उंगलियां घी में और सिर कढ़ाई में है। कोरोना के कारण स्कूल खुले या बंद रहे, उनको अब घाटा नहीं है। स्कूल के संसाधन इस्तेमाल न होने से उनका काफी खर्च बच रहा है। स्टाफ को तनख्वाह भी पूरी नहीं दे रहे। कई स्कूलों ने बिना ऑनलाइन पढ़ाई के भी पूरी फीस और वह भी दो महीनों की इकट्ठा ली।
इस बाबत अभिभावकों की ओर से उनकी पैरवी कर रहे भाजपा नेता जपिंदर ने कहा कि सरकार का फैसला एक तरफा और अभिभावकों को झटका देने वाला है। उन्होंने कहा कि शासनादेश में सिर्फ स्कूल मालिक-प्रबंधन का ही ख्याल रखा गया है। शहर में कई स्थानों पर इंटरनेट स्पीड बहुत खराब है। ऐसे में ऑनलाइन पढ़ाई के पैटर्न पर भी अंगुली उठाई जा रही है।
जपिंदर ने कहा कि सरकार को हाई कोर्ट ने आदेश दिया था कि वह स्कूल और अन्य संबंधित लोगों से बात करने के बाद ऐसा शासनादेश निकाले, जिससे न स्कूलों को दिक्कत हो और न ही अभिभावक फीस को लेकर परेशान हों। दूसरी ओर इस शासनादेश से अभिभावकों निराश और नाखुश दिख रहे हैं।

इस मुद्दे को हाई कोर्ट तक ले जाने वाले भाजपा नेता ने कहा कि आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सरकार को ये फैसला भारी भी पड़ सकता है। सरकार के फैसले के मुताबिक स्कूल ऑनलाइन पढ़ाने पर ही ट्यूशन फीस ले सकेंगे। ये नहीं कहा गया है कि ऑनलाइन पढ़ाई का मतलब कितने घंटे होंगे? आगे के महीनों की फीस ली जाएगी या नहीं। पिछली बची हुई फीस आगे के महीनों में देनी है कि नहीं? जब स्कूल बंद हो चुके थे।

उन्होंने कहा, लगता है कि इस पर विचार ही नहीं किया गया कि स्कूल फीस का मतलब ही ट्यूशन फीस होता है, जो तकरीबन 95 फीसद तक होता है। सामान्य दिनों में जब फीस ली जाती है तो स्कूल के अपने संसाधनों का इस्तेमाल करना होता है। मसलन बिजली, पानी, फर्नीचर, फोन, इमारत, साफ-सफाई व्यवस्था और खेल सामग्री के साथ ही पार्ट टाइम खेल प्रशिक्षकों पर भी खर्च होता है। ऑनलाइन पढ़ाई के कारण ये सब खर्च तो बंद हो गए हैं।
बकौल जपिंदर सिंह, अधिकतर स्कूलों के स्टाफ ने फोन और संदेश के जरिये अपना दर्द बयां किया है कि उनकी तनख्वाह आधी काट दी गई है। स्कूल की दलील है कि उनको जब पढ़ाने के लिए स्कूल आना ही नहीं पड़ रहा तो फिर तनख्वाह पूरी भी नहीं दी जा सकती है। सरकार ने ये भी नहीं कहा कि कोरोना के कारण हुई छुट्टियों के दौरान की फीस न ली जाए। सरकारी-अर्ध सरकारी कर्मचारियों के लिए व्यवस्था कर दी कि वे फीस अभी दे देंगे। सरकार की नई व्यवस्था से स्कूल प्रबंधन का सिर दर्द खत्म हो गया है।

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