इतिहास दोहराने की तैयारी

  • सोनिया और राहुल गुट में बंटती दिख रही कांग्रेस, फिर गहराई 1967 जैसी फूट की आशंका
  • वरिष्ठ नेताओं ने राहुल के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान चलाते हुए सोनिया को भेजा पत्र भेजा
  • इसमें स्थायी अध्यक्ष की तैनाती व केंद्रीय पदाधिकारियों के पारदर्शी चुनाव की उठाई गई है मांग  

नई दिल्ली। लगता है कि कांग्रेस में एक बार फिर बिखराव के कगार पर है। कांग्रेस में बुजुर्ग नेताओं की नेता तो सोनिया गांधी हैं और युवा नेताओं के सरपरस्त राहुल गांधी बने हैं। कांग्रेस की सरकारों और पार्टी में अहम पदों को लेकर और युवा तुर्क और अनुभवी नेताओं के बीच तलवारें खिंच गई हैं। इसके ताजा उदाहरण राजस्थान में युवा बनाम वरिष्ठ के बीच जारी घमासान और कांग्रेस राज्यसभा सांसदों की बैठक में राहुल गांधी बनाम सोनिया गांधी गुट के बीच हुई तीखी बहस है।
वरिष्ठ नेताओं ने शुक्रवार को राहुल के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान चलाते हुए सोनिया को पत्र भेजा है।इसमें स्थायी अध्यक्ष की नियुक्ति और केंद्रीय पदाधिकारियों के पारदर्शी चुनाव की मांग की गई है। ऐसे में पार्टी के अंदर 1967 जैसी फूट की आशंका जताई जा रही है। यदि 43 साल की सियासत देखी जाए तो इस दौरान कांग्रेस, भाजपा और जनता दल जैसी बड़ी पार्टियों से टूटकर 87 पार्टियां बनी हैं लेकिन सिर्फ 25 ही अस्तित्व में हैं। 62 पार्टियों का कोई नामोनिशान तक नहीं बचा है।
पार्टी नेताओं का मानना है कि कांग्रेस एक बार फिर 1967 जैसी परिस्थितियों का सामना कर रही है। तब कामराज के नेतृत्व में बुजुर्ग नेताओं ने इंदिरा गांधी को पार्टी से निकाल दिया था और इंदिरा ने अलग पार्टी बना ली थी। हालांकि वह ज्यादा सफल नहीं हो पाईं और 1971 के पाकिस्तान युद्ध में जीत के बाद इंदिरा कांग्रेस ने धमाकेदार जीत दर्ज की थी।
एके एंटनी ने साल 1980 में कांग्रेस (ए) नाम से पार्टी बनाई थी। हालांकि 1982 में उन्होंने अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया था, लेकिन इंदिरा गांधी के निधन तक उन्हें कांग्रेस में कोई भी पद नहीं दिया गया था। पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम ने 1996 में कांग्रेस पार्टी छोड़ दी और तमिल मनीला कांग्रेस (टीएमसी) जो कांग्रेस से टूटकर बनी थी, उसकी तमिलनाडु इकाई में शामिल हो गए थे। वर्ष 1996 में टीएमसी ने अन्य क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पार्टियों के साथ मिलकर केंद्रीय सरकार बनाई थी। इस सरकार में उन्हें वित्त मंत्री का कार्यभार दिया गया था। इसके बाद साल 2004 में जब मनमोहन सिंह की सरकार सत्ता में आई उन्हें फिर से वित्त मंत्रालय का जिम्मा सौंपा गया।
वर्ष 1996 में माधवराव सिंधिया ने कांग्रेस छोड़कर मध्यप्रदेश विकास कांग्रेस नामक पार्टी बनाई थी। 1986 में प्रणब मुखर्जी ने कांग्रेस छोड़कर अपनी अलग पार्टी राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस की स्थापना की थी। उन्होंने 1989 में इस पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया था।
कांग्रेस से टूटकर बनीं तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, वाईएसआर कांग्रेस, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी, छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस, एआईएनआर कांग्रेस, नागा पीपल्स फ्रंट, विदर्भ जनता कांग्रेस और तमिल मनीला कांग्रेस ये पार्टियां अब भी सक्रिय हैं!
उधर कलह और बिखराव की वजह से जनता दल 20 साल में छह बार टूटा। इससे टूटकर जनता दल यूनाइटेड, लोक जनशक्ति पार्टी, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोक दल, राष्ट्रीय जनता दल, बीजू जनता दल, इंडियन नेशनल लोकदल, जनता दल सेक्युलर, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी, एसजेडी, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा, जेएपी, पीएसपी, जननायक जनता पार्टी, एलजेडी और समाजवादी जनता पार्टी बनीं।
वहीं भाजपा से टूटकर बनीं 17 पार्टियां अपना अस्तित्व नहीं बचा सकीं। भाजपा छोड़ने के कुछ सालों बाद बाद उमा भारती, कल्याण सिंह, केशुभाई पटेल वापस लौट आए। कल्याण सिंह ने जनक्रांति पार्टी, उमा भारती ने जनशक्ति पार्टी, केशुभाई पटेल ने गुजरात परिवर्तन पार्टी, बाबूलाल मरांडी ने झारखंड विकास मोर्चा बनाई थी, लेकिन चुनाव मैदान में वे फ्लॉप ही साबित हुई।