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Kashmir Terror Attack : घाटी में कश्मीरी पंडित और बिहारी दलित की हत्या पर दिल कचोटने वाली चुप्पी

जब घाटी में आतंकियों के लिए ढाल बनने वाले पत्थरबाजों को सबक सिखाया जाने लगा तो कई मानवाधिकार कार्यकर्ता आगे आने लगे। हालांकि जब सेना के जवानों पर ये आतंकी खतरा बनते तो वे दिन के उजाले में भी गुम हो जाते। पिछले कुछ दिनों से भी वे सीन से गायब हैं।

जम्मू-कश्मीर में मंगलवार को तीन निर्दोष नागरिकों की हत्या कर दी गई लेकिन किसी भी मानवाधिकार कार्यकर्ता के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। सुरक्षा एजेंसियां ही नहीं आम देशवासी भी ऐसे लोगों और समूहों की चुप्पी पर सवाल उठा रहे हैं।

अगर पुलिस या सेना के जवान उन आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करते हैं जो कश्मीरियों के जान के दुश्मन बनते हैं तो मानवाधिकार उल्लंघन का शोर होने लगता है। ऐसे में लोग पूछ रहे हैं कि अब वे कहां ‘कुंभकर्ण की निद्रा’ में सोए हैं।

गरीबों के हमदर्द बिंद्रू का क्या कसूर था
मंगलवार को घाटी के जानेमाने केमिस्ट कश्मीरी पंडित माखन लाल कुंद्रू की गोली मारकर हत्या कर दी गई। 68 साल के माखनलाल पिछले 31 वर्षों से हर अमीर-गरीब की मदद कर रहे थे। जरूरतमंद लोगों को वह फ्री में दवा देते थे। उनकी दुकानें दवाओं के लिए विश्वस्त नाम थीं। श्रीनगर में वह एकता की मिसाल थे।

कहा जा रहा है कि 1992 में प्रख्यात मानवाधिकार कार्यकर्ता एच.एन. वानछू की हत्या के बाद यह पहला मौका था, जब समूची घाटी से लोग किसी की मौत का मातम मनाने के लिए जुटे।

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साथ गूंजे वैदिक मंत्र और मस्जिद की अजान
मानवतावादी व्यवसायी कहे जाने वाले माखनलाल के घर पर बुधवार को समाज के सभी तबके के लोग श्रद्धांजलि देने पहुंचे थे। कुछ समय के लिए वैदिक मंत्रों और पास की मस्जिद से ‘अजान’ की आवाज ने हवाओं में सांप्रदायिक सौहार्द घोल दिया। ये सब हुआ लेकिन किसी ऐक्टिविस्ट के मुंह से दो शब्द नहीं निकले।

मंगलवार को लगभग उसी समय नैदखाई में मोहम्मद शमी लोन और आलमगीरी बाजार में रहने वाले बिहार के भागलपुर के एक कामगार वीरेंद्र पासवान की हत्या कर दी गई। भागलपुर के वीरेंद्र पासवान श्रीनगर के लाल बाजार में ठेला लगाते थे। द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) ने बिंद्रू समेत इन सब हत्याओं की जिम्मेदारी ली है।

पाकिस्तान की नई चाल

जम्मू-कश्मीर पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों का मानना है कि TRF लश्कर-ए-तैयबा का ही एक फ्रंट है जिसे पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को स्थानीय कश्मीरियों का मूवमेंट बताकर प्रोजेक्ट करने के लिए खड़ा किया है। ऐसे में पाकिस्तान की मंशा साफ समझी जा सकती है।

मासूम लोगों को मौत के घाट उतारे जाने की इन घटनाओं पर अब तक देश का कोई एनजीओ, एक्सपर्ट या अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाएं सामने नहीं आईं, जिसने बयान जारी कर इन कायरतापूर्ण हमलों की निंदा की हो। जबकि हालत यह है कि इस साल सितंबर तक जम्मू-कश्मीर में आतंकियों ने दो दर्जन लोगों की हत्याएं की हैं। मंगलवार को हुई हत्याओं को UNHRC चीफ के हाल में दिए उस बयान के संदर्भ में भी देखा जा रहा है जिसमें उन्होंने UAPA के धड़ाधड़ इस्तेमाल (खासतौर से जम्मू-कश्मीर में), संवाद की कमी और बड़ी संख्या में हिरासत में लेने की आलोचना की थी।

विदेश में बैठकर पोस्ट लिखने वाले कहां हैं?
एक घंटे के भीतर तीन नृशंस हत्याओं के बावजूद दुनिया में कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन की बातें कोई नहीं कर रहा है। ये वही लोग हैं जिन्हें कश्मीरियों का हितैषी बताकर प्रोजेक्ट किया जाता है। ये पाकिस्तान के आतंकी मंसूबे को नाकाम करने के लिए भारतीय सुरक्षा बलों के हर ऐक्शन को लेकर ब्रिटेन, यूरोप, अमेरिका और गल्फ में बैठकर सोशल मीडिया पोस्ट लिखते हैं। लेकिन फिलहाल इन्होंने खामोशी की चादर ओढ़ ली है। भारत में भी जो लोग आतंकियों के मारे जाने पर दुखी हो जाते थे, अब इन निर्दोषों की हत्या पर छिप गए हैं।

वास्तव में, कश्मीर पर अंतरराष्ट्रीय गुस्सा दिखाने का भी एक पैटर्न है। यह सिलेक्टिव होता है। साल दर साल आतंकियों द्वारा किए जा रहे मर्डर को नजरअंदाज किया जाता रहा है। ये मानवाधिकार के पैरोकार उस आतंकी नर्सरी के सामने अंधे हो जाते हैं जो खुद को संरक्षण देने के लिए धर्म की आड़ लेते रहते हैं।

सोशल मीडिया पर भी लोगों ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की खामोशी पर गुस्सा जाहिर किया है। वास्तव में उनकी नाराजगी या निंदा से आतंकियों के हौसले को पस्त किया जा सकता है। वे धर्म की आड़ ले रहे हैं तो उस समूह से ही लोग आगे आकर उनकी निंदा करें तो ये आतंकी अलग-थलग पड़ जाएंगे। पर दुर्भाग्य है कि ऐसा कुछ हो नहीं रहा।

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