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लखीमपुर खीरी मामले में किसान नेता की भूमिका पर उठ रहे सवाल

लखीमपुर खीरी में किसानों और उत्तर प्रदेश सरकार के बीच बने गतिरोध में भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं.

हालाँकि एक तबका उनके व्यवहारिक रुख़ की प्रशंसा भी कर रहा है कि उन्होंने हालात को बेकाबू होने से बचा लिया और किसानों के आंदोलन को पटरी से नहीं उतरने दिया.

लेकिन एक तबका टिकैत पर सवाल उठा रहा है कि उन्होंने सरकार की बात मानने में जल्दबाज़ी की जबकि पूरी मांगें नहीं मानी गई थीं.

अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू ने पूरे मामले में राकेश टिकैत की भूमिका पर उठ रहे सवालों को लेकर एक रिपोर्ट को प्रमुखता से जगह दी है. अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि कई लोग राकेश टिकैत पर बीजेपी के एजेंट की तरह काम करने का आरोप लगा रहे हैं.

लखीमपुर खीरी में कुल आठ लोगों की जान गई है. इनमें चार सिख किसान हैं. द हिन्दू ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ”हालाँकि रविवार के बाद राकेश टिकैत की छवि और मज़बूत हुई है. इस इलाक़े में किसानों के एकमात्र नेता के रूप में लखीमपुर खीरी जाने की अनुमति मिली और इससे उनकी महत्वाकांक्षा और बढ़ गई है.”

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अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार, पर्यवेक्षकों का कहना है कि जनवरी में बीकेयू ने ग़ाज़ीपुर बॉर्डर को जब विरोध-प्रदर्शन का ठिकाना बनाया और विरोध-प्रदर्शन के दौरान ही एक बार टिकैत रो पड़े थे और उससे जो बढ़त मिली थी, उसे बीजेपी सरकार ने अब और हवा दे दी है.

प्रियंका गाँधी वाड्रा, अखिलेश यादव और सतीश चंद्र मिश्रा जैसे नेताओं को यूपी सरकार ने या तो हिरासत में ले लिया या उन्हें लखीमपुर खीरी जाने से रोक दिया गया. लेकिन बीकेयू नेता टिकैत को लखीमपुर खीरी पहुँचने में कोई परेशानी नहीं हुई.

द हिन्दू से बीकेयू के सूत्रों ने बताया है कि ग़ाज़ियाबाद प्रशासन टिकैत को लखीमपुर खीरी जाने देने को लेकर हिचक रहा था, लेकिन लखनऊ से उन्हें जाने देने का मौखिक आदेश दिया गया.

यूपी के चर्चित एडीजी (क़ानून-व्यवस्था) प्रशांत कुमार ने टिकैत के साथ किसानों को संबोधित किया था. प्रशांत प्रमोट होने से पहले मेरठ ज़ोन में ही थे.

द हिन्दू ने लिखा है, ”पर्यवेक्षकों के अनुसार, ये तर्क बहुत सही नहीं है कि टिकैत एक ग़ैर-राजनीतिक किसान संगठन का नेतृत्व करते हैं. क्योंकि दूसरी तरफ़ बीकेयू के ही हरियाणा प्रमुख गुरनाम सिंह चढ़नी संयुक्त किसान मोर्चा में एक अहम चेहरा हैं और उन्हें मेरठ में ही धारा 144 के उल्लंघन में हिरासत में ले लिया गया. इसके अलावा संयुक्त किसान मोर्चा के अन्य अहम नेता योगेंद्र यादव और शिव कुमार काकाजी ने अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रमों को जारी रखा.”

अख़बार के मुताबिक़, ”पर्यवेक्षकों का कहना है कि इसी साल जनवरी में गणतंत्र दिवस के वाक़ये के बाद भी ऐसा ही हुआ था. तब प्रशासन और टिकैत के ऊंचे कद ने तराई बेल्ट के किसान नेता वीएम सिंह को ग़ाज़ीपुर प्रदर्शन स्थल से हटने पर मजबूर कर दिया था.”

तराई बेल्ट के एक सीनियर किसान नेता ने अख़बार से कहा है, ”28 जनवरी को जब टिकैत ने कई मुश्किलों के बावजूद ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर ही रहने का फ़ैसला किया था तब उत्तर प्रदेश में तराई बेल्ट और उत्तराखंड के सिख किसानों को उनमें, एक नया नेता दिखा, जिन्होंने मुश्किल घड़ी में उनकी गरिमा बचाई थी. अगर वे छोड़कर चले गए होते तो 1984 की तरह स्थिति हो सकती थी.”

अख़बार ने लिखा है, ”बीजेपी ने आंशिक रूप से इसे स्वीकार किया है कि पार्टी के पास उस इलाक़े में कोई नेता नहीं है जिनकी बात संकट की स्थिति में किसान सुनते. जो टिकैत को जानते हैं, उनका कहना है कि वे अपने पिता की तरह ही किसानों के एकमात्र नेता बनना चाहते हैं.”

केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा के बेटे की गिरफ़्तारी के बदले पूरा ध्यान मुआवज़े पर देने को लेकर भी टिकैत पर सवाल उठ रहे हैं. द हिन्दू से खालसा ऐड के रविंदर सिंह ने कहा कि 45 लाख का मुआवज़ा बिना इंसाफ़ के ब्लड मनी की तरह है.

अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस ने भी पूरे मामले में टिकैत की भूमिका पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है. इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि कैसे जिस घटना को लेकर हज़ारों की संख्या में किसान सड़क पर उतर गए थे, उस ग़ुस्से को टिकैत की मदद से यूपी सरकार ने 24 घंटों के भीतर सड़क से बाहर कर दिया.

इंडियन एक्सप्रेस से लखीमपुर खीरी में मौजूद एक अधिकारी ने बताया कि टिकैत ने सरकार की आलोचना में कोई वक़्त नहीं गँवाया और उन्होंने किसानों को सीधे संबोधित किया और लखीमपुर खीरी तभी छोड़ा जब किसान सड़क से हट गए.

कथित तौर पर वरिष्ठ अधिकारियों की टीम फाइलन बातचीत पर मीडिया से बातचीत नहीं करना चाहती थी, मगर राकेश टिकैत मीडिया से बातचीत चाहते थे। उन्होंने मीडिया को बताया कि रविवार की घटना को लेकर किसान अपना आंदोलन समाप्त कर रहे हैं और किसानों को संबोधित करने चले गए। सूत्रों की मानें तो चतुर्वेदी और अंतिम वार्ता में शामिल अन्य अधिकारियों के अलावा अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) अवनीश कुमार अवस्थी ने भी अहम भूमिका निभाई। सूत्रों ने बताया कि अवस्थी मौके पर मौजूद अधिकारियों और टिकैत के लगातार संपर्क में थे।

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