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मिट्टी में बच्चों को न खेलने देने की प्रवृत्ति घातक

  • स्कूल के प्रोजेक्ट और अथाह होमवर्क ने छीना बचपन

गजे सिंह बिष्ट

देहरादून। वर्तमान में सीबीएसई का जो पैटर्न प्राथमिक लेबल पर है, उसने नन्हे-मुन्नों का बचपन छीन लिया है। तमाम किताब-कापियों से एक तो बच्चों को लाद दिया जाता है। शारीरिक बोझ के बाद उन्हें तरह-तरह के प्रोजेक्ट दिए जाते हैं। आज कागज से मोर बनाना है कल टोकरी बनानी है आदि-आदि। बच्चे के पास सांस लेने तक की फुर्सत नहीं है। साथ में अभिभावकों को बच्चे के लिए सामग्री जुटाने का तनाव। होमवर्क भी इतना अधिक कि बच्चों की लिखते-लिखते अंगुली सूझ जाती है। नई शिक्षा नीति के तहत आगे किस तरह का पाठ्यक्रम होगा। वो तो बाद में पता चलेगा। लेकिन, वर्तमान में जिस तरह से छोटे बच्चों को काम दिया जा रहा है। उसने तो एक तरह से बच्चों का बचपन छीन ​लिया है। खासकर कक्षा एक से पांच तक के बच्चों को मानसिक और शारीरिक तौर से बिल्कुल अपंग बनाकर रख दिया है। इस बोझिल पढ़ाई से बच्चों का मानसिक और बौधिक विकास हो पाना कतई संभव नहीं है। बल्कि, उनका बौधिक और मान​​सिक विकास कमजोर पड़ रहा है। पहले जिस समय हम लोगों ने स्कूल में पढ़ाई की। उस दौरान प्राइवेट स्कूलों की दुकानें तो कम ही होती थी। सरकारी स्कूलों में कक्षा-1 में एक किताब, कक्षा दो में दो किताब हिंदी और गणित और साथ में लकड़ी की पाटी होती थी। कक्षा तीन से कक्षा पांच तक चार किताब, हिंदी, गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, चार विषयों के चार कापी और एक रफ्फ कापी होती थी। बच्चों पर किसी रह का बोझ नहीं होता था। मामूली गृह कार्य करने के बाद बच्चे जमकर मिट्टी में खेलते थे। अभिभावकों की ओर से भी मिट्टी में खेलने देने की फुल आजादी होती थी। मिट्टी में खेलने से बच्चे शारीरिक तौर पर मजबूत होते हैं। उसकी मांस पेशियां खिंचती हैं। इस सब से दूर रखने के लिए अभिभावक भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। हम सोचते हैं कि बच्चा भले ही घर के अंदर फोन पर अपनी आंखें कमजोर कर ले। लेकिन, बाहर जाकर अपने कपड़े मिट्टी में गंदे न करें। इस प्रवृत्ति ने बच्चों का बचपन छीन लिया है। वह शारीरिक तौर पर कमजोर तो होता ही है। साथ ही चश्मे लगाने के लिए मजबूर भी होना पड़ता है।

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