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उमेश कुमार को लगा जोर का झटका!

देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में उमेश कुमार द्वारा एक पटिशन को रद्द कर दिया है। उमेश कुमार उत्तराखंड में कई मुक़दमों में आरोपी है जिनमें सबसे महत्वपूर्ण मुक़दमा 100/2018 PS राजपुर देहरादून का है। जिसमें उमेश कुमार पर उसी के संपादक द्वारा ब्लैकमेलिंग और सरकार गिराने की साज़िश का आरोप लगाया गया था। इस मुक़दमे में उमेश कुमार की गिरफ़्तारी हुई और बाद में उत्तराखंड उच्च न्यायालय से उमेश को बेल मिल गयी थी। इसके बाद उमेश कुमार द्वारा नामचीन वकीलों की लंबी चौड़ी क़तार खड़ी कर उत्तराखंड के सभी मुकदमों में स्टे ले लिया गया। उमेश कुमार के वकीलों ने पहले तो नैनीताल हाईकोर्ट में भरसक प्रयास कर उस पर दायर मुक़दमों को ख़ारिज कराने की भरपूर कोशिश की करी लेकिन हाईकोर्ट में राहत न मिलने के बाद उमेश कुमार को सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा। जहाँ उसे बड़ी राहत मिली और उसके सभी मुकदमों में प्रोसीडिंग स्टे दे दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जब तक ट्रांसपोर्टेशन की सुनवाई नहीं हो जाएगी तब तक उमेश कुमार पर उत्तराखंड सरकार और प्रशासन की ओर से किसी प्रकार की कोई भी कार्यवाही नहीं की जाएगी।लेकिन उत्तराखंड सरकार ने मज़बूती से अपने सरकारी अधिवक्ताओं के साथ सुप्रीम कोर्ट में मामले को ख़ारिज करवाने की कवायद शुरू कर दी। इसी मामले में आयुष पंडित के वक़ील अरविंद शुक्ला ने बताया कि मुलज़िम पक्ष ने बेहद चालाकी से सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर पेटिशन दायर कर सिर्फ़ उन्हीं लोगों को नोटिस दिया जो कि मुल्ज़िम पक्ष के थे यानी उमेश कुमार के साथ सह अभियुक्त थे। मामले की गंभीरता देख वादी के वक़ील अरविंद शुक्ला ने इंटरवेनशन नोटिस भी दाख़िल किया और अदालत से गुज़ारिश की कि वादी को भी इस मामले में अपना पक्ष रखने की इजाज़त दी जाए जिसे कोर्ट ने स्वीकार किया। तक़रीबन 4-5 सुनवाईयों में दोनों तरफ़ से वकीलों ने जमकर बहस करी, उत्तराखंड सरकार की तरफ से जहाँ एडवोकेट जे. एस रावत, कुलदीप परिहार व अन्य अधिवक्ताओं ने मोर्चा संभाला वहीं उमेश कुमार की तरफ़ से कपिल सिब्बल ने बहस करी। हालाँकि स्टेट और वादी की ओर से वकीलों ने कोर्ट को बताया कि किस तरह 27 से ज़्यादा मुक़दमे होने के बावजूद भी उमेश कुमार सिर्फ़ एक मुक़दमे में जेल गया है और इसके अतिरिक्त बलात्कार वसूली क़ब्ज़ा और कई अन्य धाराओं पर दर्ज मुक़दमे में एक बार भी उमेश कुमार को गिरफ़्तार तक नहीं किया गया ऐसे में उमेश का रसूख़ दिल्ली-एनसीआर में बख़ूबी समझा जा सकता है। वकीलों ने यह भी बताया कि उमेश कुमार के ऊपर लगे बलात्कार के आरोप में भी फ़ाइनल रिपोर्ट लग गई है व मुक़द्दमा करने वाली लड़की को ही उमेश कुमार द्वारा पुलिस से साठगांठ कर जेल भेज दिया गया।ऐसे में तमाम गवाह और मुक़दमे से जुड़े अन्य लोगों के ऊपर दबाव बनाने की आशंका पूर्ण रूप से की जा सकती है, इसलिए मुक़दमे की सुनवाई उत्तराखंड में ही होनी चाहिए न कि दिल्ली एनसीआर में।वकीलों ने यह भी बताया कि पूर्व में उमेश कुमार के ऊपर दर्ज कई मुक़दमों को उत्तराखंड सरकार ने वापस लिया था। ऐसे में यह कहना कि उत्तराखंड में फ़ेयर ट्रायल नहीं हो पाएगा यह पूरी तरह से ग़लत होगा। अभियोजन पक्ष की तरफ़ से वकीलों ने जो दलील रखी उसे मुलज़िम पक्ष के वक़ील कपिल सिब्बल और कोर्ट ने भी माना। अब सर्वोच्च अदालत द्वारा उमेश कुमार के ख़िलाफ़ यह फ़ैसला आने से उमेश की मुश्किलें बढ़ती नज़र आ रही है।

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