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त्रिवेंद्र के बाद तीरथ ने भी अब प्रेमचंद की बढ़ाईं मुश्किलें!

सियासत के मोहरे

  • पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा, गड़बड़ी की है तो अब भुगतें
  • सीएम धामी भी कर चुके स्पीकर से जांच का आग्रह
  • भाजपा अध्यक्ष जांच से पहले ही दे रहे ‘क्लीन चिट’

देहरादून। जहां एक ओर उत्तराखंड विधानसभा में बैक डोर से मनमानी भर्तियों की जांच शुरू हो गई है तो दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के बाद अब पूर्व सीएम तीरथ सिंह रावत ने भी पूर्व स्पीकर और मौजूदा काबीना मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल पर खुला हमला बोल दिया है।
उन्होंने साफ कहा कि गड़बड़ी की है तो भुगतना भी होगा। भाजपा गंदगी साफ करने लिए सत्ता में आई है न कि कांग्रेस के कारनामों को आगे बढ़ाने के लिये। इस मामले में प्रेमंचद अब चारों ओर से घिरते नजर आ रहे हैं। उनके खिलाफ अब भाजपा से ही आवाज मुखर हो रही है। इस मामले में सबसे पहले पूर्व सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ने प्रेमचंद के रवैये पर सवाल खड़े किये थे और तीरथ सिंह रावत ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

मीडिया से बातचीत में सांसद रावत ने कहा, यह कहना बेहद गलत है कि कांग्रेस के समय में भी इसी तरह से भर्तियां हुईं हैं। भाजपा सत्ता में सिस्टम की गंदगी को साफ करने के लिए सत्ता में आई है। न कि कांग्रेस के काले कारनामों को आगे बढ़ाने के लिये। तीरथ ंने साफ कहा कि गडबड़ी की है तो हर हाल में उसे भुगतना भी होगा।
दिलचस्प बात यह है कि इस मामले में अभी तक भाजपा की ओर से प्रेमचंद के खिलाफ कोई बात नहीं की गई है। अलबत्ता भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र सिंह भट्ट इनकी जांच से पहले ही क्लीन चिट देकर कह रहे हैं कि सभी नियुक्तियां नियमानुसार हुईं हैं। हो सकता है कि वो ऐसा अपने भाई के मोह में कह रहे हों, क्योंकि उनके भाई को भी विधानसभा में नौकरी दी गई है।
हालांकि यह मामला सुर्खियों में आते ही सीएम पुष्कर सिंह धामी ने स्पीकर ऋतु खंडूड़ी को एक खत लिखकर इन सभी नियुक्तियों की जांच का आग्रह किया था। इसके बाद स्पीकर ने इनकी जांच के लिए पूर्व प्रमुख सचिव दिलीप सिंह कोटिया की अध्यक्षता में एक तीन सदस्यीय कमेटी का गठन कर एक माह में रिपोर्ट मांगी है। 

फिलहाल तीरथ सिंह रावत के सीधे हमले से यह बात साफ नजर आ रही है कि आने वाले समय में काबीना मंत्री प्रेमचंद की मुश्किलें और भी बढ़ सकती है। हो सकता है कि इस मामले में वह अकेले रह जायें और उनका साथ देने वाला कोई भी न दिखे। सियासत का यह सबसे बेरहम रूप देखने को मिल सकता है। 

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